दिया मुझको बहुत तूने
पर थोडा सा कुछ और दे
जो टूटे थे टुकडे मेरे
समेट उनको जोड दे

जब बिखरे थे सपने सारे
तब भी सर झुकाया था
तेरे दर पर खडी थी हरदम
चाहे माथे कुछ भी लगाया था

माँगा नही कुछ अब तक
आज भी कोइ ज़ोर नही
तेरे रसते से हटके रब्बा
मेरे रस्ते, और कोइ मोड नहीं

झुकना जो तेरे चरणो पे
उस राह मुझको छोड दे
तुझ तक आने को रब्बा
फिर – एक बार मुझको जोड दे

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