ऐ खुदा, भर मेरा दिल
अपनी मोहब्बत की सिसकियों से कुछ इस तरह
की किसी और के बसने की कोई गुंजाइश ही न रहे

तेरी स्याही की उल्फत देख, मेरा कलम कुछ शर्मा गया
अब क्या लिखूँ नगम कोई, जो तेरे गीतों से बतला सके

तेरे ख़त मुझसे खफ़ा हैं, या तुम कुछ नाराज़ हो गए ?
संदेस मिलते नही मेरे, या खुद ही अब बेज़ार हो गए ?