तेरी स्याही की उल्फत देख, मेरा कलम कुछ शर्मा गया
अब क्या लिखूँ नगम कोई, जो तेरे गीतों से बतला सके

तेरे ख़त मुझसे खफ़ा हैं, या तुम कुछ नाराज़ हो गए ?
संदेस मिलते नही मेरे, या खुद ही अब बेज़ार हो गए ?

बिन अक्षर वोह उड़ते पन्ने,
और कलम की सूखी हुई स्याई
सुना चली वोह अनसुनी दास्तां
जो हम केह के भी केह ना सके

आये नही हम वादा कर, पर इंतज़ार तुमनॆ भी ना किया
इश्क मुलाकात मे तब है, जब कोइ राह देख रहा हो

कया गिला करूँ तुझसे
रूठते तो अपनो से है

वफ़ा कर ना पाए तुम, हर्ज नही
अब थोड़ी बेवफ़ाई ही कर लो

है इरादा कुछ, ईशारा तो समझें
कि मेरे अलफ़ज़ कुछ और केहते हैं
और आवाज़ कुछ और 

लोग केहते है, वोह खाब ना देखो, जो यकीनन पूरे ना होगे…
पर कैसे ? जब  है मालूम की
जो पूरा होने का वदा करे, वोह खाब नही होते